सपना
"पापा, कुछ पैसों की ज़रुरत है।"
"कितने ?" अमर जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच आई थी। "पाँच हज़ार।"
"ठीक है, मैं भेजता हूँ।"
जब-जब मिठ्ठू पैसे की फरमाइश करता, अमर जी का दिल बैठ जाता था। गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ा कर महीने के हज़ार-डेढ़ हज़ार कमाते, जिससे घर का खर्चा-पानी भी बड़ी मुश्किल से ही निकल पाता था। ज़ायदाद के नाम पे डेढ़ बीघा ज़मीन का एक टुकड़ा था, पर वो भी मिठ्ठू के पढाई के ख़ातिर पिछले तीन वर्षों से बंधक पड़ा था। अब तो लोग कर्ज देने से भी कतराते थे।
मिठ्ठू NIT Patna से Computer Science में B.Tech कर रहा था। मिठ्ठू की सफलता, अमर जी की जिन्दगी की आख़िरी ख्वाइस थी। अमर जी को इस बात का पूरा भरोसा था कि उनकी ये तपस्या आखिर रंग लायेगी, मिठ्ठू अगले वर्ष तक किसी बड़े से MNC में काम कर रहा होग।
"यार, पापा ने कहा कि एक-दो दिनों में पैसे भेज देंगे। " अपने मित्रमंडली को खुशखबरी देता हुआ मिठ्ठू बोला " अरे कल्लू भैया 4 GOLDFLAKE देना, और माचिस भी। "
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